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पापा, मैं डूब रहा हूं… घना कोहरा, 40 फीट का खुला गड्ढा और सिस्टम की लापरवाही; कैसे गई 27 साल के युवराज की जान?

नोएडा के सेक्टर-150 में घने कोहरे और प्रशासनिक लापरवाही ने 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की जान ले ली. आधी रात ऑफिस से घर लौटते वक्त उनकी कार बिना किसी बैरिकेडिंग या रिफ्लेक्टर के खुले 40 फीट गहरे गड्ढे में जा गिरी. पानी से भरे निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट में फंसे युवराज ने आख़िरी सांस तक संघर्ष किया और पिता को फोन कर मदद की गुहार लगाई. पुलिस, दमकल और SDRF मौके पर पहुंचीं, लेकिन देर से शुरू हुआ रेस्क्यू उनकी जान नहीं बचा सका. हादसे के बाद प्रशासन ने आनन-फानन में बैरिकेडिंग लगाई, जिससे सवाल उठे कि सुरक्षा पहले क्यों नहीं की गई.

पापा, मैं डूब रहा हूं… घना कोहरा, 40 फीट का खुला गड्ढा और सिस्टम की लापरवाही; कैसे गई 27 साल के युवराज की जान?
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
Curated By: नवनीत कुमार

Published on: 18 Jan 2026 1:46 PM

रात का वक्त था, जब सड़कें अपने सबसे खामोश रूप में होती हैं. नोएडा के सेक्टर-150 की ओर जाती सड़क पर स्ट्रीट लाइट्स धुंध में घुल चुकी थीं और हेडलाइट्स की रोशनी भी कुछ गज से आगे नहीं देख पा रही थी. युवराज मेहता की कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. ऑफिस का थकान भरा दिन पीछे छूट चुका था और घर की गर्माहट बस कुछ मिनट दूर थी. उसे क्या पता था कि सिस्टम की एक अनदेखी, उसकी जिंदगी को इसी मोड़ पर रोक देगी.

कार जैसे ही एटीएस ले-ग्रैंडियोज के टी-पॉइंट के पास पहुंची, कोहरा और घना हो गया. अचानक सड़क का किनारा गायब-सा लगा. न कोई बैरिकेड, न रिफ्लेक्टर, न चेतावनी बोर्ड. एक पल में संतुलन टूटा और कार नाले की दीवार तोड़ते हुए 40 फीट गहरे उस गड्ढे में जा गिरी, जिसे बारिश और रिसाव के पानी ने मौत के कुंड में बदल दिया था. आवाज़ आई, फिर सब कुछ पानी और अंधेरे में डूब गया.

पापा, मैं डूब रहा हूं…

कार गिरते ही युवराज ने किसी तरह सीट बेल्ट खोली और बाहर निकलकर कार की छत तक पहुंचा. पानी तेजी से बढ़ रहा था. सांसें उखड़ने लगीं. उसी हड़बड़ी में उसने पिता राजकुमार मेहता को फोन किया. आवाज़ कांप रही थी, शब्द टूट रहे थे. “पापा… चारों तरफ पानी है… मैं डूब रहा हूं… प्लीज बचा लीजिए.” फोन के उस सिरे पर पिता की दुनिया थम गई. वह दौड़ पड़े, उम्मीद थी कि समय साथ देगा.

घटनास्थल पर पहुंचते ही पिता ने देखा कि कोहरे के बीच एक टॉर्च की रोशनी हिल रही है. वह युवराज था. कार की छत पर बैठा, हाथ हिलाता, मदद की गुहार लगाता. पिता ने पुकारा, आवाज़ें टकराईं, मगर दूरी और हालात बीच में खड़े थे. वह पल जब पिता अपने बेटे को देख रहा था, सुन रहा था, मगर छू नहीं पा रहा था. किसी भी इंसान की रूह तोड़ देने के लिए काफी था.

रेस्क्यू आया, पर समय हाथ से फिसलता गया

पुलिस और दमकल की गाड़ियां पहुंचीं, फिर SDRF भी आई. पर कोहरा, अंधेरा और गहराता पानी. सबने मिलकर रेस्क्यू की रफ्तार को बांध दिया. रस्सियां उतारी गईं, टॉर्चें चमकीं, मगर हर कोशिश पानी की ऊंचाई से हारती दिखी. युवराज हर मिनट कमजोर होता गया, फिर भी वह आख़िरी सांस तक लड़ता रहा.

करीब पौने दो घंटे बाद, रात 1:45 बजे, कार पानी में पूरी तरह समा गई. टॉर्च की रोशनी बुझ गई. आवाज़ें खामोश हो गईं. पिता वहीं खड़े थे. आंखें खुली, दिल टूट चुका. NDRF ने देर रात सर्च शुरू किया और सुबह चार बजे युवराज को बाहर निकाला गया. अस्पताल पहुंचते-पहुंचते, समय हमेशा के लिए निकल चुका था.

यह हादसा नहीं, एक छोड़ी गई ज़िम्मेदारी थी

जिस गड्ढे में युवराज गिरा, वह नोएडा प्राधिकरण के कब्जे वाले प्लॉट में था. फिर भी सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं- न बैरिकेड, न रिफ्लेक्टर, न डायवर्जन. स्थानीय लोगों ने पहले भी चेताया था, मगर फाइलें चलती रहीं. युवराज की मौत ने बताया कि चेतावनियां तब सुनी जाती हैं, जब बहुत देर हो चुकी होती है.

हादसे के बाद की ‘तत्काल सक्रियता’

मौत के बाद सिस्टम जागा. रातों-रात मलबा डलवाया गया, बोर्ड लगे, बैरिकेड दिखे. सवाल वही कि जो काम बाद में हुआ, वह पहले क्यों नहीं? क्या किसी की जान जाना जरूरी था, ताकि सुरक्षा दिखे? यह सक्रियता किसी पिता की सूनी आंखें नहीं भर सकती.

एक इंजीनियर, जो भविष्य लिख रहा था

27 साल का युवराज गुरुग्राम की आईटी कंपनी में काम करता, सपनों की सूची लंबी थी. परिवार का सहारा, माता-पिता की उम्मीद, अपनी मेहनत पर भरोसा. वह हर रात घर लौटता था, उस रात भी लौटा पर घर ने उसे नहीं देखा. पिता की शिकायत पर जांच शुरू हुई है. जिम्मेदारी तय करने की बातें हो रही हैं. मगर सवाल हवा में तैर रहे हैं. क्या जवाबदेही तय होगी? क्या ऐसी जगहें सुरक्षित होंगी? या यह कहानी भी अगली खबर आने तक याद रहेगी?

कोहरे से ज्यादा घातक थी अनदेखी

यह कहानी मौसम की नहीं, व्यवस्था की है. एक खुला गड्ढा, गायब चेतावनियां, और सुस्त रेस्क्यू. इन सबने मिलकर एक ज़िंदगी छीन ली. युवराज की कहानी हमें याद दिलाती है कि सड़कें सिर्फ रास्ते नहीं होतीं; वे भरोसा मांगती हैं. और जब भरोसा टूटता है, तो कीमत किसी के बेटे को चुकानी पड़ती है.

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