Shashi Kapoor Birth Anniversary: जब शशि कपूर ने ठुकरा दिया था अपना पहला नेशनल अवार्ड, बताई थी हैरान कर देने वाली वजह- जानें पूरा किस्सा
शशि कपूर ने अपने करियर में ‘धर्मपुत्र’ से लेकर ‘दीवार’ तक कई शानदार किरदार निभाए और यश चोपड़ा के साथ हिट जोड़ी बनाई. उनकी सादगी, प्रोफेशनलिज्म और एक्टिंग आज भी उन्हें बॉलीवुड के सबसे खास सितारों में शामिल करती है.
शशि कपूर (Shashi Kapoor) को उनके बेहद अट्रैक्टिव और खूबसूरत चेहरे के लिए आज भी याद किया जाता है. उनका चेहरा ऐसा था कि देखते ही दिल पिघल जाता था. उन्होंने अपने लंबे करियर में, जो छह दशकों से भी ज्यादा चला, न सिर्फ भारतीय बल्कि इंटरनेशनल फिल्मों में भी काम किया. उन्होंने अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की विरासत यानी पृथ्वी थिएटर को फिर से जीवित किया और बहुत मेहनत से इसे चलाया. साथ ही, 1960 और 1970 के दशक की कई सुपरहिट फिल्मों में उन्होंने कमाल का एक्टिंग किया. खास तौर पर निर्देशक यश चोपड़ा ने शशि कपूर को कई यादगार फिल्में दीं, जिनमें से ज्यादातर बहुत बड़ी हिट साबित हुईं. आज शशि कपूर की 88वीं बर्थ एनिवर्सरी है जो 18 मार्च को मनाई जाती है.
उन्होंने यश चोपड़ा के साथ काम किया और बहुत सफलता पाई. शशि कपूर ने अपने करियर की शुरुआत बचपन में ही कर ली थी. 1940 के दशक के आखिर में वे बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में नजर आए. लेकिन बड़े होकर उनकी पहली लीड रोल मिला यश चोपड़ा की फिल्म धर्मपुत्र (1961) में. यह फिल्म विभाजन के समय की कहानी पर बनी थी और इसे नेशनल अवार्ड भी मिला.
जब शशि ने निभाया था हिंदू कट्टरपंथी का रोल
इस फिल्म में शशि ने एक ऐसे युवक का किरदार निभाया जो मुस्लिम माता-पिता से पैदा हुआ था, लेकिन हिंदू परिवार में पला-बढ़ा. उसे अपनी असली पहचान का पता नहीं था. वह हिंदू कट्टरपंथी बन जाता है और मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की कोशिश करता है. यह भूमिका बहुत मुश्किल थी क्योंकि किरदार बाहर से तो कट्टर और घृणित लगता था, लेकिन अंदर से वह अपनी पहचान और अस्तित्व के संघर्ष से जूझ रहा था. शशि ने इस भूमिका को इतनी शान से निभाया कि वे एक गंभीर एक्टर के रूप में पहचाने गए.
क्यों ठुकराया नेशनल अवार्ड?
शशि ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा था, 'मुझे यश चोपड़ा ने 'धर्मपुत्र' में जिंदगी की सबसे अहम भूमिका दी. इसके लिए मुझे नेशनल अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन मैंने इसे ठुकरा दिया क्योंकि मुझे लगा कि मेरी एक्टिंग और बेहतर हो सकती थी. उनकी यह विनम्रता भी लोगों को बहुत पसंद आई.
राज कपूर और शम्मी कपूर के साथ बननी थी 'वक्त' फिल्म
इस फिल्म के बाद यश चोपड़ा और शशि कपूर की जोड़ी ने कई शानदार फिल्में दीं. यश चोपड़ा ने शशि को बहुत महत्व दिया. उन्होंने एक बार शाहरुख खान से बातचीत में बताया कि शुरू में वे 'वक्त' जैसी फिल्म में तीन भाइयों के लिए राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर को लेना चाहते थे, लेकिन फिर सोचा कि तीनों भाई एक जैसे दिखेंगे तो कहानी पर असर पड़ेगा इसलिए उन्होंने दो बड़े भाइयों के लिए नए कलाकार चुने, लेकिन शशि को जरूर रखा क्योंकि उन्हें शशि की एक्टिंग पहले से पसंद थी.
बड़े स्टार्स के सामने घबराए हुए थे शशि
यश ने कहा, 'शशि मेरे दोस्त हैं. हमने 'धर्मपुत्र' बनाई थी. उन्हें मेरी फिल्म में काम करना ही होगा.' धर्मपुत्र' में शशि को बड़े-बड़े कलाकारों जैसे बलराज साहनी, सुनील दत्त और राज कुमार के साथ काम करना था. वे काफी घबराए हुए थे. उन्होंने यश से कहा कि उन्हें बाकियों के बीच दबना नहीं चाहिए. यश ने उन्हें बराबर स्क्रीन टाइम दिया और सबके साथ अच्छा तालमेल बनाया. फिर करीब दस साल बाद आया उनका अगला बड़ा सहयोग - दीवार (1975). यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे क्लासिक फिल्मों में से एक है.
उभरते एक्टर के सामने निभाया सेकंड लीड
हालांकि बड़ी बात यह थी कि शशि ने एक सुपरस्टार होने के बाद भी एक उभरते एक्टर के साथ सपोर्टिव रोल किया बल्कि अमिताभ बच्चन फिल्म की लीड रोल में थे. उन्होंने रवि नाम के एक ईमानदार, आदर्शवादी पुलिस अफसर का किरदार निभाया, जो कानून का पालन करके समाज को बेहतर बनाना चाहता है. वहीं अमिताभ का किरदार उनका भाई विजय था, जो गुस्सैल और व्यवस्था से नफरत करने वाला था. शशि का किरदार फिल्म में विवेक और अच्छाई की आवाज था.
क्या अमिताभ बच्चन के साथ हुआ था क्लैश?
कुछ अफवाहें आईं कि शशि को धोखे से छोटी भूमिका दी गई, लेकिन शशि ने इन्हें साफ इनकार किया. उन्होंने कहा, 'मुझे शुरू से पता था कि मैं दूसरी मुख्य भूमिका निभा रहा हूं इसमें कोई बुराई नहीं. हॉलीवुड में बड़े-बड़े कलाकार भी सपोर्टिव रोल करते हैं.' 'दीवार' में उनका एक सीन बहुत मशहूर है जहां वे अमिताभ से कहते हैं, 'भाई, तुम दस्तखत करोगे या नहीं? और आवाज ऊंची-ऊंची होती जाती है. यश चोपड़ा ने उन्हें ओवरएक्टिंग से रोका और सही तरीके से फिल्माया. उसी समय 'दीवार' और कभी कभी (1976) की शूटिंग साथ-साथ चल रही थी. 'कभी कभी' में शशि ने एक बुजुर्ग, खुशमिजाज पति का रोल किया, जो अपनी पत्नी के पुराने प्रेम के बारे में जानता है, लेकिन वह ईर्ष्या नहीं करता. वह अतीत को स्वीकार करता है और परिवार के साथ खुशी से जीता है. शशि को लेखक और निर्देशक ने पूरा फ्रीडम दिया था, और उनकी एक्टिंग बहुत यादगार रहा.
कभी नहीं टूटी यश-शशि की जोड़ी
1970 के दशक के अंत में यश चोपड़ा ने शशि को 'त्रिशूल' (1978) और 'काला पत्थर' (1979) जैसी फिल्मों में भी लिया. 'त्रिशूल' में शशि ने अमिताभ बच्चन के नाजायज भाई का रोल किया. 'काला पत्थर' में भी उनका किरदार मजबूत था. 'सिलसिला' (1981) में उनकी छोटी लेकिन बड़ी भूमिका थी, जो कहानी को आगे बढ़ाती थी. उनकी मौजूदगी फिल्म में छाप छोड़ गई. 'सिलसिला' के बाद यश और शशि ने फिल्मों में साथ काम नहीं किया, लेकिन उनकी दोस्ती कभी नहीं टूटी.
2017 को कहा अलविदा
2010 में जब शशि को फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला, तो यश चोपड़ा ने ही उन्हें ट्रॉफी दी थी. शशि कपूर का निधन 4 दिसंबर 2017 को हुआ, लेकिन उनकी फिल्में, उनकी एक्टिंग और पृथ्वी थिएटर आज भी जिंदा हैं. वे एक ऐसे स्टार थे जो हमेशा समय पर पहुंचते थे, प्रोफेशनल थे, नखरे नहीं करते थे और सबके साथ अच्छा व्यवहार रखते थे. उनकी यादें आज भी दिलों में बसी हैं.




