किंगमेकर या ब्लॉकर! सिर्फ 29 सीटों के बाद ढाई साल के लिए मेयर पद की मांग, शिंदे गुट कितना सही?
बीएमसी चुनाव नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति में नया सियासी पेंच फंस गया है. भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने सिर्फ 29 सीटें जीतने के बावजूद ढाई साल के मेयर पद की मांग रख दी है. इसी मांग के चलते भाजपा–शिंदे गुट में खींचतान तेज हो गई है. शिंदे ने अपने सभी पार्षदों को फाइव-स्टार होटल में शिफ्ट कर दिया है, जिससे 2022 की शिवसेना बगावत की यादें ताजा हो गई हैं.
बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में पहुंच गई है. भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और पहली बार उसका मेयर बनने का रास्ता साफ दिख रहा है. लेकिन इसी बीच एकनाथ शिंदे गुट ने ढाई साल के मेयर पद की मांग रखकर पूरे समीकरण को जटिल बना दिया है. सवाल यही है कि सिर्फ 29 सीटें जीतने के बाद क्या शिंदे गुट का यह दावा राजनीतिक तौर पर सही ठहरता है?
नतीजों के तुरंत बाद शिंदे गुट के 29 पार्षदों को बांद्रा के ताज लैंड्स एंड होटल में शिफ्ट कर दिया गया. होटल के बाहर कड़ा पहरा है और अंदर रणनीतिक बैठकें चल रही हैं. यह कदम साफ संकेत देता है कि मेयर पद को लेकर अंदरखाने तनाव बढ़ चुका है. भाजपा जहां संख्याबल के आधार पर मेयर पद अपना हक मान रही है, वहीं शिंदे गुट दबाव की राजनीति खेलता दिख रहा है.
क्या है शिंदे गुट की दलील?
सूत्रों के मुताबिक शिंदे गुट का तर्क है कि 2026 शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है. ऐसे में कम से कम ढाई साल तक मुंबई का मेयर शिवसेना का होना चाहिए. यह मांग भावनात्मक और वैचारिक आधार पर रखी जा रही है, न कि सिर्फ संख्या बल पर. इसी बिंदु से भाजपा और शिंदे गुट के बीच खींचतान शुरू हो गई है. उधर उद्धव ठाकरे गुट के नेता संजय राउत ने इस मांग पर अलग ही एंगल पेश किया है. उनका कहना है कि एकनाथ शिंदे खुद नहीं चाहते कि बीएमसी में भाजपा का मेयर बने, इसलिए वे अपने पार्षदों को होटल में “सुरक्षित” रखे हुए हैं. इस बयान ने सियासी चर्चाओं को और तेज कर दिया है.
होटल पॉलिटिक्स और 2022 की बगावत की यादें
बीएमसी में कुल 227 वार्ड हैं और बहुमत का आंकड़ा 114 है. भाजपा ने 89 वार्ड जीते हैं, जबकि शिंदे गुट के पास 29 सीटें हैं. यानी भाजपा को बहुमत के लिए शिंदे गुट की जरूरत है. यही मजबूरी शिंदे गुट को मोलभाव की ताकत देती है. इसी वजह से मेयर पद को लेकर ढाई साल का दांव खेला गया है. शिंदे गुट का पार्षदों को होटल में रखना 2022 की उस बगावत की याद दिलाता है, जब शिवसेना टूट गई थी. तब भी विधायकों को पहले सूरत और फिर गुवाहाटी ले जाया गया था. वही रणनीति अब नगर निगम स्तर पर दोहराई जा रही है, ताकि किसी भी तरह की टूट या हॉर्स ट्रेडिंग को रोका जा सके.
विपक्ष की गणित और कांग्रेस की अंदरूनी कलह
दूसरी ओर, शिवसेना (यूबीटी) 65 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. मनसे की 6, एनसीपी (एसपी) की 1, कांग्रेस की 24, AIMIM की 8 और सपा की 2 सीटें जोड़ दी जाएं, तो विपक्षी आंकड़ा 106 तक पहुंचता है. यह बहुमत से अब भी 8 सीट कम है. यही कमी दलबदल की आशंका को जन्म दे रही है. इसी बीच बीएमसी चुनाव में हार के बाद मुंबई कांग्रेस की अंदरूनी कलह भी सामने आ गई है. हार का ठीकरा अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ पर फोड़ने वाले नेता जगताप को कांग्रेस आलाकमान ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है. इससे साफ है कि विपक्ष खुद भी पूरी तरह संगठित नहीं दिख रहा.
तो क्या शिंदे गुट की मांग सही है?
राजनीतिक रूप से देखें तो 29 सीटों के साथ ढाई साल का मेयर पद मांगना संख्याबल के हिसाब से कमजोर दावा लगता है. लेकिन गठबंधन राजनीति में “किंगमेकर” की भूमिका निभा रहा शिंदे गुट इस कमजोरी को दबाव में बदलना चाहता है. भाजपा के लिए यह फैसला आसान नहीं है. या तो सहयोगी को संतुष्ट करे, या फिर जोखिम उठाए. फिलहाल तस्वीर यही है कि भाजपा का पलड़ा भारी है, लेकिन शिंदे गुट की मांग ने बीएमसी की मेयर कुर्सी को पूरी तरह सस्पेंस में डाल दिया है. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह मांग सिर्फ रणनीतिक चाल थी या मुंबई की सत्ता में सचमुच बड़ा उलटफेर लाने वाली है.





